श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.5.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नैकत्र प्रियसंवासः सुहृदां चित्रकर्मणाम्।

ओघेन व्यूह्यमानानां प्लवानां स्रोतसो यथा॥ २५

naikatra priyasaṃvāsaḥ suhṛdāṃ citrakarmaṇām|

oghena vyūhyamānānāṃ plavānāṃ srotaso yathā|| 25

अर्थ

जैसे नदीके प्रबल प्रवाहमें बहते हुए बेड़े और तिनके सदा एक साथ नहीं रह सकते, वैसे ही सगे-सम्बन्धी और प्रेमियोंका भी एक स्थानपर रहना सम्भव नहीं है—यद्यपि वह सबको प्रिय लगता है। क्योंकि सबके प्रारब्धकर्म अलग-अलग होते हैं॥ २५॥

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