श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.5.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

कच्चित् पशव्यं निरुजं भूर्यम्बुतृणवीरुधम्।

बृहद्वनं तदधुना यत्रास्से त्वं सुहृद‍्वृतः॥ २६

kaccit paśavyaṃ nirujaṃ bhūryambutṛṇavīrudham|

bṛhadvanaṃ tadadhunā yatrāsse tvaṃ suhṛdvṛtaḥ|| 26

अर्थ

आजकल तुम जिस महावनमें अपने भाई-बन्धु और स्वजनोंके साथ रहते हो, उसमें जल, घास और लता-पत्रादि तो भरे-पूरे हैं न? वह वन पशुओंके लिये अनुकूल और सब प्रकारके रोगोंसे तो बचा है?॥ २६॥

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