श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.5.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

दिष्ट्या संसारचक्रेऽस्मिन् वर्तमानः पुनर्भवः।

उपलब्धो भवानद्य दुर्लभं प्रियदर्शनम्॥ २४

diṣṭyā saṃsāracakre'smin vartamānaḥ punarbhavaḥ|

upalabdho bhavānadya durlabhaṃ priyadarśanam|| 24

अर्थ

यह भी बड़े आनन्दका विषय है कि आज हमलोगोंका मिलना हो गया। अपने प्रेमियोंका मिलना भी बड़ा दुर्लभ है। इस संसारका चक्र ही ऐसा है। इसे तो एक प्रकारका पुनर्जन्म ही समझना चाहिये॥ २४॥

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