परमात्मन्! आपने ही अपनी शक्तिसे इसकी रचना की है और आप ही अपनी काल, माया आदि शक्तियोंसे इसमें प्रविष्ट होकर जितनी भी वस्तुएँ देखी और सुनी जाती हैं, उनके रूपमें प्रतीत हो रहे हैं॥ १९॥✎ 1680
आत्मसृष्टमिदं विश्वमन्वाविश्य स्वशक्तिभिः।
ईयते बहुधा ब्रह्मन् श्रुतप्रत्यक्षगोचरम्॥ १९
परमात्मन्! आपने ही अपनी शक्तिसे इसकी रचना की है और आप ही अपनी काल, माया आदि शक्तियोंसे इसमें प्रविष्ट होकर जितनी भी वस्तुएँ देखी और सुनी जाती हैं, उनके रूपमें प्रतीत हो रहे हैं॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.48.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 437) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)