॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.48.20
यथा हि भूतेषु चराचरेषु
मह्यादयो योनिषु भान्ति नाना।
एवं भवान् केवल आत्मयोनि-
ष्वात्माऽऽत्मतन्त्रो बहुधा विभाति॥ २०
yathā hi bhūteṣu carācareṣu
mahyādayo yoniṣu bhānti nānā|
evaṃ bhavān kevala ātmayoni-
ṣvātmā''tmatantro bahudhā vibhāti|| 20
अर्थ
जैसे पृथ्वी आदि कारणतत्त्वोंसे ही उनके कार्य स्थावर-जंगम शरीर बनते हैं; वे उनमें अनुप्रविष्ट-से होकर अनेक रूपोंमें प्रतीत होते हैं, परन्तु वास्तवमें वे कारणरूप ही हैं। इसी प्रकार हैं तो केवल आप ही, परन्तु अपने कार्यरूप जगत्में स्वेच्छासे अनेक रूपोंमें प्रतीत होते हैं। यह भी आपकी एक लीला ही है॥ २०॥✎ 1680