श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

उद्धव तथा गोपियोंकी बातचीत और भ्रमरगीत

श्रीशुक उवाच

तं वीक्ष्य कृष्णानुचरं व्रजस्त्रियः

प्रलम्बबाहुं नवकंजलोचनम्।

पीताम्बरं पुष्करमालिनं लस-

न्मुखारविन्दं मणिमृष्टकुण्डलम्॥ १

taṃ vīkṣya kṛṣṇānucaraṃ vrajastriyaḥ

pralambabāhuṃ navakaṃjalocanam|

pītāmbaraṃ puṣkaramālinaṃ lasa-

nmukhāravindaṃ maṇimṛṣṭakuṇḍalam|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! गोपियोंने देखा कि श्रीकृष्णके सेवक उद्धवजीकी आकृति और वेषभूषा श्रीकृष्णसे मिलती-जुलती है। घुटनोंतक लंबी-लंबी भुजाएँ हैं, नूतन कमलदलके समान कोमल नेत्र हैं, शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए हैं, गलेमें कमल-पुष्पोंकी माला है, कानोंमें मणिजटित कुण्डल झलक रहे हैं और मुखारविन्द अत्यन्त प्रफुल्लित है॥ १॥

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