श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

शुचिस्मिताः कोऽयमपीच्यदर्शनः

कुतश्‍च कस्याच्युतवेषभूषणः।

इति स्म सर्वाः परिवव्रुरुत्सुका-

स्तमुत्तमश्‍लोकपदाम्बुजाश्रयम् ॥ २

śucismitāḥ ko'yamapīcyadarśanaḥ

kutaśca kasyācyutaveṣabhūṣaṇaḥ|

iti sma sarvāḥ parivavrurutsukā-

stamuttamaślokapadāmbujāśrayam || 2

अर्थ

पवित्र मुसकानवाली गोपियोंने आपसमें कहा—‘यह पुरुष देखनेमें तो बहुत सुन्दर है। परन्तु यह है कौन? कहाँसे आया है? किसका दूत है? इसने श्रीकृष्ण-जैसी वेषभूषा क्यों धारण कर रखी है?’ सब-की-सब गोपियाँ उनका परिचय प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त उत्सुक हो गयीं और उनमेंसे बहुत-सी पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके आश्रित तथा उनके सेवक-सखा उद्धवजीको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं॥ २॥

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