श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.46.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 46 · अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

दृष्टं श्रुतं भूतभवद् भविष्यत्

स्थास्नुश्‍चरिष्णुर्महदल्पकं च।

विनाच्युताद् वस्तु तरां न वाच्यं

स एव सर्वं परमार्थभूतः॥ ४३

dṛṣṭaṃ śrutaṃ bhūtabhavad bhaviṣyat

sthāsnuścariṣṇurmahadalpakaṃ ca|

vinācyutād vastu tarāṃ na vācyaṃ

sa eva sarvaṃ paramārthabhūtaḥ|| 43

अर्थ

बाबा! जो कुछ देखा या सुना जाता है—वह चाहे भूतसे सम्बन्ध रखता हो, वर्तमानसे अथवा भविष्यसे; स्थावर हो या जंगम हो, महान् हो अथवा अल्प हो—ऐसी कोई वस्तु ही नहीं है जो भगवान् श्रीकृष्णसे पृथक् हो। बाबा! श्रीकृष्णके अतिरिक्त ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे वस्तु कह सकें। वास्तवमें सब वे ही हैं, वे ही परमार्थ सत्य हैं॥ ४३॥

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