॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.46.44
एवं निशा सा ब्रुवतोर्व्यतीता
नन्दस्य कृष्णानुचरस्य राजन्।
गोप्यः समुत्थाय निरूप्य दीपान्
वास्तून् समभ्यर्च्य दधीन्यमन्थन्॥ ४४
evaṃ niśā sā bruvatorvyatītā
nandasya kṛṣṇānucarasya rājan|
gopyaḥ samutthāya nirūpya dīpān
vāstūn samabhyarcya dadhīnyamanthan|| 44
अर्थ
परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके सखा उद्धव और नन्दबाबा इसी प्रकार आपसमें बात करते रहे और वह रात बीत गयी। कुछ रात शेष रहनेपर गोपियाँ उठीं, दीपक जलाकर उन्होंने घरकी देहलियोंपर वास्तुदेवका पूजन किया, अपने घरोंको झाड़-बुहारकर साफ किया और फिर दही मथने लगीं॥ ४४॥