श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.46.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 46 · अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

न चास्य कर्म वा लोके सदसन्मिश्रयोनिषु।

क्रीडार्थः सोऽपि साधूनां परित्राणाय कल्पते॥ ३९

na cāsya karma vā loke sadasanmiśrayoniṣu|

krīḍārthaḥ so'pi sādhūnāṃ paritrāṇāya kalpate|| 39

अर्थ

इस लोकमें उनका कोई कर्म नहीं है फिर भी वे साधुओंके परित्राणके लिये, लीला करनेके लिये देवादि सात्त्विक, मत्स्यादि तामस एवं मनुष्य आदि मिश्र योनियोंमें शरीर धारण करते हैं॥ ३९॥

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