श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.46.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 46 · अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

सत्त्वं रजस्तम इति भजते निर्गुणो गुणान्।

क्रीडन्‍नतीतोऽत्र गुणैः सृजत्यवति हन्त्यजः॥ ४०

sattvaṃ rajastama iti bhajate nirguṇo guṇān|

krīḍannatīto'tra guṇaiḥ sṛjatyavati hantyajaḥ|| 40

अर्थ

भगवान् अजन्मा हैं। उनमें प्राकृत सत्त्व, रज आदिमेंसे एक भी गुण नहीं है। इस प्रकार इन गुणोंसे अतीत होनेपर भी लीलाके लिये खेल-खेलमें वे सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंको स्वीकार कर लेते हैं और उनके द्वारा जगत‍्की रचना, पालन और संहार करते हैं॥ ४०॥

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