॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.46.40
सत्त्वं रजस्तम इति भजते निर्गुणो गुणान्।
क्रीडन्नतीतोऽत्र गुणैः सृजत्यवति हन्त्यजः॥ ४०
sattvaṃ rajastama iti bhajate nirguṇo guṇān|
krīḍannatīto'tra guṇaiḥ sṛjatyavati hantyajaḥ|| 40
अर्थ
भगवान् अजन्मा हैं। उनमें प्राकृत सत्त्व, रज आदिमेंसे एक भी गुण नहीं है। इस प्रकार इन गुणोंसे अतीत होनेपर भी लीलाके लिये खेल-खेलमें वे सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंको स्वीकार कर लेते हैं और उनके द्वारा जगत्की रचना, पालन और संहार करते हैं॥ ४०॥