श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.44.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 44 · अथ चतुश्‍चत्वारिंशोऽध्यायः

जनाः प्रजहृषुः सर्वे कर्मणा रामकृष्णयोः।

ऋते कंसं विप्रमुख्याः साधवः साधु साध्विति॥ ३०

janāḥ prajahṛṣuḥ sarve karmaṇā rāmakṛṣṇayoḥ|

ṛte kaṃsaṃ vipramukhyāḥ sādhavaḥ sādhu sādhviti|| 30

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामकी इस अद्भुत लीलाको देखकर सभी दर्शकोंको बड़ा आनन्द हुआ। श्रेष्ठ ब्राह्मण और साधु पुरुष ‘धन्य है, धन्य है’—इस प्रकार कहकर प्रशंसा करने लगे। परन्तु कंसको इससे बड़ा दुःख हुआ। वह और भी चिढ़ गया॥ ३०॥

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