श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.42.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 42 · अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

का त्वं वरोर्वेतदु हानुलेपनं

कस्यांगने वा कथयस्व साधु नः।

देह्यावयोरंगविलेपमुत्तमं

श्रेयस्ततस्ते नचिराद् भविष्यति॥ २

kā tvaṃ varorvetadu hānulepanaṃ

kasyāṃgane vā kathayasva sādhu naḥ|

dehyāvayoraṃgavilepamuttamaṃ

śreyastataste nacirād bhaviṣyati|| 2

अर्थ

‘सुन्दरी! तुम कौन हो? यह चन्दन किसके लिये ले जा रही हो? कल्याणि! हमें सब बात सच-सच बतला दो। यह उत्तम चन्दन, यह अंगराग हमें भी दो। इस दानसे शीघ्र ही तुम्हारा परम कल्याण होगा’॥ २॥

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