॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.42.3
सैरन्ध्र्युवाच✎ 2102
दास्यस्म्यहं सुन्दर कंससम्मता
त्रिवक्रनामा ह्यनुलेपकर्मणि।
मद्भावितं भोजपतेरतिप्रियं
विना युवां कोऽन्यतमस्तदर्हति॥ ३
dāsyasmyahaṃ sundara kaṃsasammatā
trivakranāmā hyanulepakarmaṇi|
madbhāvitaṃ bhojapateratipriyaṃ
vinā yuvāṃ ko'nyatamastadarhati|| 3
अर्थ
उबटन आदि लगानेवाली सैरन्ध्री कुब्जाने कहा—‘परम सुन्दर! मैं कंसकी प्रिय दासी हूँ। महाराज मुझे बहुत मानते हैं। मेरा नाम त्रिवक्रा (कुब्जा) है। मैं उनके यहाँ चन्दन, अंगराग लगानेका काम करती हूँ। मेरे द्वारा तैयार किये हुए चन्दन और अंगराग भोजराज कंसको बहुत भाते हैं। परन्तु आप दोनोंसे बढ़कर उसका और कोई उत्तम पात्र नहीं है’॥ ३॥ भगवान्के सौन्दर्य, सुकुमारता, रसिकता, मन्दहास्य, प्रेमालाप और चारु चितवनसे कुब्जाका मन हाथसे निकल गया। उसने भगवान्पर अपना हृदय न्योछावर कर दिया। उसने दोनों भाइयोंको वह सुन्दर और गाढ़ा अंगराग दे दिया॥ ४॥