॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.42.1
अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
कुब्जापर कृपा, धनुषभंग और कंसकी घबड़ाहट
श्रीशुक उवाच
अथ व्रजन् राजपथेन माधवः
स्त्रियं गृहीताङ्गविलेपभाजनाम्।
विलोक्य कुब्जां युवतीं वराननां
पप्रच्छ यान्तीं प्रहसन् रसप्रदः॥ १
atha vrajan rājapathena mādhavaḥ
striyaṃ gṛhītāṅgavilepabhājanām|
vilokya kubjāṃ yuvatīṃ varānanāṃ
papraccha yāntīṃ prahasan rasapradaḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण जब अपनी मण्डलीके साथ राजमार्गसे आगे बढ़े, तब उन्होंने एक युवती स्त्रीको देखा। उसका मुँह तो सुन्दर था, परन्तु वह शरीरसे कुबड़ी थी। इसीसे उसका नाम पड़ गया था ‘कुब्जा’। वह अपने हाथमें चन्दनका पात्र लिये हुए जा रही थी। भगवान् श्रीकृष्ण प्रेमरसका दान करनेवाले हैं, उन्होंने कुब्जापर कृपा करनेके लिये हँसते हुए उससे पूछा—॥ १॥