aiśvaryamatulaṃ lebhe gatiṃ caikāntināṃ tu yā|| 14
अर्थ
प्रभो! आपके युगल चरणोंको पखारकर महात्मा बलिने वह यश प्राप्त किया, जिसका गान सन्त पुरुष करते हैं। केवल यश ही नहीं—उन्हें अतुलनीय ऐश्वर्य तथा वह गति प्राप्त हुई, जो अनन्य प्रेमी भक्तोंको प्राप्त होती है॥ १४॥✎ 2101
अवनिज्याङ्घ्रियुगलमासीच्छ्लोक्यो बलिर्महान्।
ऐश्वर्यमतुलं लेभे गतिं चैकान्तिनां तु या॥ १४
प्रभो! आपके युगल चरणोंको पखारकर महात्मा बलिने वह यश प्राप्त किया, जिसका गान सन्त पुरुष करते हैं। केवल यश ही नहीं—उन्हें अतुलनीय ऐश्वर्य तथा वह गति प्राप्त हुई, जो अनन्य प्रेमी भक्तोंको प्राप्त होती है॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.41.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 387) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)