हम गृहस्थ हैं। आप अपने चरणोंकी धूलिसे हमारा घर पवित्र कीजिये। आपके चरणोंकी धोवन (गंगाजल या चरणामृत) से अग्नि, देवता, पितर—सब-के-सब तृप्त हो जाते हैं॥ १३॥✎ 2101
पुनीहि पादरजसा गृहान् नो गृहमेधिनाम्।
यच्छौचेनानुतृप्यन्ति पितरः साग्नयः सुराः॥ १३
हम गृहस्थ हैं। आप अपने चरणोंकी धूलिसे हमारा घर पवित्र कीजिये। आपके चरणोंकी धोवन (गंगाजल या चरणामृत) से अग्नि, देवता, पितर—सब-के-सब तृप्त हो जाते हैं॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.41.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 387) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)