श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

पुनीहि पादरजसा गृहान् नो गृहमेधिनाम्।

यच्छौचेनानुतृप्यन्ति पितरः सा‌ग्‍नयः सुराः॥ १३

punīhi pādarajasā gṛhān no gṛhamedhinām|

yacchaucenānutṛpyanti pitaraḥ sāgnayaḥ surāḥ|| 13

अर्थ

हम गृहस्थ हैं। आप अपने चरणोंकी धूलिसे हमारा घर पवित्र कीजिये। आपके चरणोंकी धोवन (गंगाजल या चरणामृत) से अग्‍नि, देवता, पितर—सब-के-सब तृप्त हो जाते हैं॥ १३॥✎ 2101

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2101 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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