श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

आपस्तेऽङ्‌घ्र्यवनेजन्यस्त्रीँल्लोकाञ्छुचयोऽपुनन्।✎ 2100

शिरसाधत्त याः शर्वः स्वर्याताः सगरात्मजाः॥ १५

āpaste'ṅghryavanejanyastrīm̐llokāñchucayo'punan|

śirasādhatta yāḥ śarvaḥ svaryātāḥ sagarātmajāḥ|| 15

अर्थ

आपके चरणोदक—गंगाजीने तीनों लोक पवित्र कर दिये। सचमुच वे मूर्तिमान् पवित्रता हैं। उन्हींके स्पर्शसे सगरके पुत्रोंको सद्गति प्राप्त हुई और उसी जलको स्वयं भगवान् शंकरने अपने सिरपर धारण किया॥ १५॥✎ 2101

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #2100 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ङ्‌घ्रॺवनेज → ङ्‌घ्र्यवनेज
  • #2101 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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