श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.40.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 40 · अथ चत्वारिंशोऽध्यायः

सोऽहं तवाङ्‌घ्र्युपगतोऽस्म्यसतां दुरापं ✎ 1857 2099

तच्चाप्यहं भवदनुग्रह ईश मन्ये।

पुंसो भवेद् यर्हि संसरणापवर्ग-

स्त्वय्यब्जनाभ सदुपासनया मतिः स्यात्॥ २८

so'haṃ tavāṅghryupagato'smyasatāṃ durāpaṃ

taccāpyahaṃ bhavadanugraha īśa manye|

puṃso bhaved yarhi saṃsaraṇāpavarga-

stvayyabjanābha sadupāsanayā matiḥ syāt|| 28

अर्थ

इस प्रकार भटकता हुआ मैं आपके उन चरण-कमलोंकी छत्रछायामें आ पहुँचा हूँ, जो दुष्टोंके लिये दुर्लभ हैं। मेरे स्वामी! इसे भी मैं आपका कृपाप्रसाद ही मानता हूँ। क्योंकि पद्मनाभ! जब जीवके संसारसे मुक्त होनेका समय आता है, तब सत्पुरुषोंकी उपासनासे चित्तवृत्ति आपमें लगती है॥ २८॥✎ 1671

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1671 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विज्ञान-घन → विज्ञानघन
  • #1857 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): घ्र‌ ॺु → घ्र्यु
  • #2099 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ङ्‌घ्रॺुपगतो → ङ्‌घ्र्युपगतो

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