श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.40.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 40 · अथ चत्वारिंशोऽध्यायः

नमो विज्ञानमात्राय सर्वप्रत्ययहेतवे।

पुरुषेशप्रधानाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये॥ २९

namo vijñānamātrāya sarvapratyayahetave|

puruṣeśapradhānāya brahmaṇe'nantaśaktaye|| 29

अर्थ

प्रभो! आप केवल विज्ञानस्वरूप हैं, विज्ञानघन हैं। जितनी भी प्रतीतियाँ होती हैं, जितनी भी वृत्तियाँ हैं, उन सबके आप ही कारण और अधिष्ठान हैं। जीवके रूपमें एवं जीवोंके सुख-दुःख आदिके निमित्त काल, कर्म, स्वभाव तथा प्रकृतिके रूपमें भी आप ही हैं तथा आप ही उन सबके नियन्ता भी हैं। आपकी शक्तियाँ अनन्त हैं। आप स्वयं ब्रह्म हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ २९॥✎ 1671

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1671 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विज्ञान-घन → विज्ञानघन

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