मैं अविनाशी अक्षर वस्तुके ज्ञानसे रहित हूँ। इसीसे मेरे मनमें अनेक वस्तुओंकी कामना और उनके लिये कर्म करनेके संकल्प उठते ही रहते हैं। इसके अतिरिक्त ये इन्द्रियाँ भी जो बड़ी प्रबल एवं दुर्दमनीय हैं, मनको मथ-मथकर बलपूर्वक इधर-उधर घसीट ले जाती हैं। इसीलिये इस मनको मैं रोक नहीं पाता॥ २७॥✎ 1671
नोत्सहेऽहं कृपणधीः कामकर्महतं मनः।
रोद्धुं प्रमाथिभिश्चाक्षैर्ह्रियमाणमितस्ततः॥ २७
मैं अविनाशी अक्षर वस्तुके ज्ञानसे रहित हूँ। इसीसे मेरे मनमें अनेक वस्तुओंकी कामना और उनके लिये कर्म करनेके संकल्प उठते ही रहते हैं। इसके अतिरिक्त ये इन्द्रियाँ भी जो बड़ी प्रबल एवं दुर्दमनीय हैं, मनको मथ-मथकर बलपूर्वक इधर-उधर घसीट ले जाती हैं। इसीलिये इस मनको मैं रोक नहीं पाता॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.40.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 385) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/40/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)