यत्र क्व वा पूर्वशत्रुर्मा हिंसीः कृपणान् वृथा॥ १२
kiṃ mayā hatayā manda jātaḥ khalu tavāntakṛt|
yatra kva vā pūrvaśatrurmā hiṃsīḥ kṛpaṇān vṛthā|| 12
अर्थ
‘रे मूर्ख! मुझे मारनेसे तुझे क्या मिलेगा? तेरे पूर्वजन्मका शत्रु तुझे मारनेके लिये किसी स्थानपर पैदा हो चुका है। अब तू व्यर्थ निर्दोष बालकोंकी हत्या न किया कर’॥ १२॥
किं मया हतया मन्द जातः खलु तवान्तकृत्।
यत्र क्व वा पूर्वशत्रुर्मा हिंसीः कृपणान् वृथा॥ १२
‘रे मूर्ख! मुझे मारनेसे तुझे क्या मिलेगा? तेरे पूर्वजन्मका शत्रु तुझे मारनेके लिये किसी स्थानपर पैदा हो चुका है। अब तू व्यर्थ निर्दोष बालकोंकी हत्या न किया कर’॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.4.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 146) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/4/12/