श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

चारुप्रसन्‍नवदनं चारुहासनिरीक्षणम्।

सुभ्रून्‍नसं चारुकर्णं सुकपोलारुणाधरम्॥ ४७

cāruprasannavadanaṃ cāruhāsanirīkṣaṇam|

subhrūnnasaṃ cārukarṇaṃ sukapolāruṇādharam|| 47

अर्थ

उनका वदन बड़ा ही मनोहर और प्रसन्‍नताका सदन है। उनका मधुर हास्य और चारु चितवन चित्तको चुराये लेती है। भौंहें सुन्दर और नासिका तनिक ऊँची तथा बड़ी ही सुघड़ है। सुन्दर कान, कपोल और लाल-लाल अधरोंकी छटा निराली ही है॥ ४७॥✎ 1433 1434

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1433 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रह्महृद) → ब्रह्मह्रद)
  • #1434 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मरकत-मणिके → मरकतमणिके

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