श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

सहस्रशिरसं देवं सहस्रफणमौलिनम्।

नीलाम्बरं बिसश्‍वेतं शृङ्गैः श्‍वेतमिव स्थितम्॥ ४५

sahasraśirasaṃ devaṃ sahasraphaṇamaulinam|

nīlāmbaraṃ bisaśvetaṃ śṛṅgaiḥ śvetamiva sthitam|| 45

अर्थ

शेषजीके हजार सिर हैं और प्रत्येक फणपर मुकुट सुशोभित है। कमलनालके समान उज्ज्वल शरीरपर नीलाम्बर धारण किये हुए हैं और उनकी ऐसी शोभा हो रही है, मानो सहस्र शिखरोंसे युक्त श्‍वेतगिरि कैलास शोभायमान हो॥ ४५॥✎ 1433 1434

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1433 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रह्महृद) → ब्रह्मह्रद)
  • #1434 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मरकत-मणिके → मरकतमणिके

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