श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

यस्यानुरागललितस्मितवल्गुमन्त्र-

लीलावलोकपरिरम्भणरासगोष्ठ्याम्।✎ 1166

नीताः स्म नः क्षणमिव क्षणदा विना तं

गोप्यः कथं न्वतितरेम तमो दुरन्तम्॥ २९

yasyānurāgalalitasmitavalgumantra-

līlāvalokaparirambhaṇarāsagoṣṭhyām|

nītāḥ sma naḥ kṣaṇamiva kṣaṇadā vinā taṃ

gopyaḥ kathaṃ nvatitarema tamo durantam|| 29

अर्थ

सखियो! जिनकी प्रेमभरी मनोहर मुसकान, रहस्यकी मीठी-मीठी बातें, विलासपूर्ण चितवन और प्रेमालिंगनसे हमने रासलीलाकी वे रात्रियाँ—जो बहुत विशाल थीं—एक क्षणके समान बिता दी थीं। अब भला, उनके बिना हम उन्हींकी दी हुई अपार विरहव्यथाका पार कैसे पावेंगी॥ २९॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1166 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): लीलावलोक-परिरम्भणरासगोष्ठ्याम्। → लीलावलोकपरिरम्भणरासगोष्ठ्याम्।

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