श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

निवारयामः समुपेत्य माधवं

किं नोऽकरिष्यन् कुलवृद्धबान्धवाः।

मुकुन्दसंगान्‍निमिषार्धदुस्त्यजाद्

दैवेन विध्वंसितदीनचेतसाम्॥ २८

nivārayāmaḥ samupetya mādhavaṃ

kiṃ no'kariṣyan kulavṛddhabāndhavāḥ|

mukundasaṃgānnimiṣārdhadustyajād

daivena vidhvaṃsitadīnacetasām|| 28

अर्थ

चलो, हम स्वयं ही चलकर अपने प्राणप्यारे श्यामसुन्दरको रोकेंगी; कुलके बड़े-बूढ़े और बन्धुजन हमारा क्या कर लेंगे? अरी सखी! हम आधे क्षणके लिये भी प्राणवल्लभ नन्दनन्दनका संग छोड़नेमें असमर्थ थीं। आज हमारे दुर्भाग्यने हमारे सामने उनका वियोग उपस्थित करके हमारे चित्तको विनष्ट एवं व्याकुल कर दिया है॥ २८॥

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