श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

अनार्द्रधीरेष समास्थितो रथं

तमन्वमी च त्वरयन्ति दुर्मदाः।

गोपा अनोभिः स्थविरैरुपेक्षितं

दैवं च नोऽद्य प्रतिकूलमीहते॥ २७

anārdradhīreṣa samāsthito rathaṃ

tamanvamī ca tvarayanti durmadāḥ|

gopā anobhiḥ sthavirairupekṣitaṃ

daivaṃ ca no'dya pratikūlamīhate|| 27

अर्थ

सखी! हमारे ये श्यामसुन्दर भी तो कम निठुर नहीं हैं। देखो-देखो, वे भी रथपर बैठ गये। और मतवाले गोपगण छकड़ोंद्वारा उनके साथ जानेके लिये कितनी जल्दी मचा रहे हैं। सचमुच ये मूर्ख हैं। और हमारे बड़े-बूढ़े! उन्होंने तो इन लोगोंकी जल्दबाजी देखकर उपेक्षा कर दी है कि ‘जाओ जो मनमें आवे, करो!’ अब हम क्या करें? आज विधाता सर्वथा हमारे प्रतिकूल चेष्टा कर रहा है॥ २७॥

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