॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.39.26
मैतद्विधस्याकरुणस्य नाम भू-
दक्रूर इत्येतदतीव दारुणः।
योऽसावनाश्वास्य सुदुःखितं जनं
प्रियात्प्रियं नेष्यति पारमध्वनः॥ २६
maitadvidhasyākaruṇasya nāma bhū-
dakrūra ityetadatīva dāruṇaḥ|
yo'sāvanāśvāsya suduḥkhitaṃ janaṃ
priyātpriyaṃ neṣyati pāramadhvanaḥ|| 26
अर्थ
देखो सखी! यह अक्रूर कितना निठुर, कितना हृदयहीन है। इधर तो हम गोपियाँ इतनी दुःखित हो रही हैं और यह हमारे परम प्रियतम नन्ददुलारे श्यामसुन्दरको हमारी आँखोंसे ओझल करके बहुत दूर ले जाना चाहता है और दो बात कहकर हमें धीरज भी नहीं बँधाता, आश्वासन भी नहीं देता। सचमुच ऐसे अत्यन्त क्रूर पुरुषका ‘अक्रूर’ नाम नहीं होना चाहिये था॥ २६॥