श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.36.10

दशम स्कन्ध · अध्याय 36 · अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः

अग्रन्यस्तविषाणाग्रः स्तब्धासृग्लोचनोऽच्युतम्।

कटाक्षिप्याद्रवत्तूर्णमिन्द्रमुक्तोऽशनिर्यथा॥ १०

agranyastaviṣāṇāgraḥ stabdhāsṛglocano'cyutam|

kaṭākṣipyādravattūrṇamindramukto'śaniryathā|| 10

अर्थ

उसने अपने तीखे सींग आगे कर लिये। लाल-लाल आँखोंसे टकटकी लगाकर श्रीकृष्णकी ओर टेढ़ी नजरसे देखता हुआ वह उनपर इतने वेगसे टूटा, मानो इन्द्रके हाथसे छोड़ा हुआ वज्र हो॥ १०॥

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