श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.36.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 36 · अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः

सख्युरंसे भुजाभोगं प्रसार्यावस्थितो हरिः।

सोऽप्येवं कोपितोऽरिष्टः खुरेणावनिमुल्लिखन्।

उद्यत्पुच्छभ्रमन्मेघः क्रुद्धः कृष्णमुपाद्रवत्॥ ९

sakhyuraṃse bhujābhogaṃ prasāryāvasthito hariḥ|

so'pyevaṃ kopito'riṣṭaḥ khureṇāvanimullikhan|

udyatpucchabhramanmeghaḥ kruddhaḥ kṛṣṇamupādravat|| 9

अर्थ

देख, तुझ-जैसे दुरात्मा दुष्टोंके बलका घमंड चूर-चूर कर देनेवाला यह मैं हूँ।’ इस प्रकार ललकारकर भगवान्‌ने ताल ठोंकी और उसे क्रोधित करनेके लिये वे अपने एक सखाके गलेमें बाँह डालकर खड़े हो गये। भगवान् श्रीकृष्णकी इस चुनौतीसे वह क्रोधके मारे तिलमिला उठा और अपने खुरोंसे बड़े जोरसे धरती खोदता हुआ श्रीकृष्णकी ओर झपटा। उस समय उसकी उठायी हुई पूँछके धक्केसे आकाशके बादल तितर-बितर होने लगे॥ ८-९॥

यह अर्थ श्लोक 8–9 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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