श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.34.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 34 · अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

गोप्यस्तद्गीतमाकर्ण्य मूर्च्छिता नाविदन् नृप।

स्रंसद्दुकूलमात्मानं स्रस्तकेशस्रजं ततः॥ २४

gopyastadgītamākarṇya mūrcchitā nāvidan nṛpa|

sraṃsaddukūlamātmānaṃ srastakeśasrajaṃ tataḥ|| 24

अर्थ

उनका वह गान सुनकर गोपियाँ मोहित हो गयीं। परीक्षित्! उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि नहीं रही कि वे उसपरसे खिसकते हुए वस्त्रों और चोटियोंसे बिखरते हुए पुष्पोंको सँभाल सकें॥ २४॥

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