श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.34.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 34 · अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

जगतुः सर्वभूतानां मनःश्रवणमङ्गलम्।

तौ कल्पयन्तौ युगपत् स्वरमण्डलमूर्च्छितम्॥ २३

jagatuḥ sarvabhūtānāṃ manaḥśravaṇamaṅgalam|

tau kalpayantau yugapat svaramaṇḍalamūrcchitam|| 23

अर्थ

अभी-अभी सायंकाल हुआ था। आकाशमें तारे उग आये थे और चाँदनी छिटक रही थी। बेलाके सुन्दर गन्धसे मतवाले होकर भौंरे इधर-उधर गुनगुना रहे थे तथा जलाशयमें खिली हुई कुमुदिनीकी सुगन्ध लेकर वायु मन्द-मन्द चल रही थी। उस समय उनका सम्मान करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने एक ही साथ मिलकर राग अलापा। उनका राग आरोह-अवरोह स्वरोंके चढ़ाव-उतारसे बहुत ही सुन्दर लग रहा था। वह जगत‍्के समस्त प्राणियोंके मन और कानोंको आनन्दसे भर देनेवाला था॥ २२-२३॥

यह अर्थ श्लोक 22–23 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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