श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

कृत्वा तावन्तमात्मानं यावतीर्गोपयोषितः।

रेमे स भगवांस्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया॥ २०

kṛtvā tāvantamātmānaṃ yāvatīrgopayoṣitaḥ|

reme sa bhagavāṃstābhirātmārāmo'pi līlayā|| 20

अर्थ

परीक्षित्! यद्यपि भगवान् आत्माराम हैं—उन्हें अपने अतिरिक्त और किसीकी भी आवश्यकता नहीं है—फिर भी उन्होंने जितनी गोपियाँ थीं, उतने ही रूप धारण किये और खेल-खेलमें उनके साथ इस प्रकार विहार किया॥ २०॥✎ 1669

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1669 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: झिल-मिला → झिलमिला

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