श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

तासामतिविहारेण श्रान्तानां वदनानि सः।

प्रामृजत् करुणः प्रेम्णा शन्तमेनाङ्ग पाणिना॥ २१

tāsāmativihāreṇa śrāntānāṃ vadanāni saḥ|

prāmṛjat karuṇaḥ premṇā śantamenāṅga pāṇinā|| 21

अर्थ

जब बहुत देरतक गान और नृत्य आदि विहार करनेके कारण गोपियाँ थक गयीं, तब करुणामय भगवान् श्रीकृष्णने बड़े प्रेमसे स्वयं अपने सुखद करकमलोंके द्वारा उनके मुँह पोंछे॥ २१॥✎ 1669

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1669 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: झिल-मिला → झिलमिला

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