श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्की प्यारी गोपियाँ विरहके आवेशमें इस प्रकार भाँति-भाँतिसे गाने और प्रलाप करने लगीं। अपने कृष्ण-प्यारेके दर्शनकी लालसासे वे अपनेको रोक न सकीं, करुणाजनक सुमधुर स्वरसे फूट-फूटकर रोने लगीं॥ १॥
इति गोप्यः प्रगायन्त्यः प्रलपन्त्यश्च चित्रधा।
रुरुदुः सुस्वरं राजन् कृष्णदर्शनलालसाः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्की प्यारी गोपियाँ विरहके आवेशमें इस प्रकार भाँति-भाँतिसे गाने और प्रलाप करने लगीं। अपने कृष्ण-प्यारेके दर्शनकी लालसासे वे अपनेको रोक न सकीं, करुणाजनक सुमधुर स्वरसे फूट-फूटकर रोने लगीं॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.32.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 327) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/32/1/