श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.31.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु

भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु।

तेनाटवीमटसि तद् व्यथते न किंस्वित्

कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ १९

yatte sujātacaraṇāmburuhaṃ staneṣu

bhītāḥ śanaiḥ priya dadhīmahi karkaśeṣu|

tenāṭavīmaṭasi tad vyathate na kiṃsvit

kūrpādibhirbhramati dhīrbhavadāyuṣāṃ naḥ|| 19

अर्थ

तुम्हारे चरण कमलसे भी सुकुमार हैं। उन्हें हम अपने कठोर स्तनोंपर भी डरते-डरते बहुत धीरेसे रखती हैं कि कहीं उन्हें चोट न लग जाय। उन्हीं चरणोंसे तुम रात्रिके समय घोर जंगलमें छिपे-छिपे भटक रहे हो! क्या कंकड़, पत्थर आदिकी चोट लगनेसे उनमें पीड़ा नहीं होती? हमें तो इसकी सम्भावनामात्रसे ही चक्कर आ रहा है। हम अचेत होती जा रही हैं। श्रीकृष्ण! श्यामसुन्दर! प्राणनाथ! हमारा जीवन तुम्हारे लिये है, हम तुम्हारे लिये जी रही हैं, हम तुम्हारी हैं॥ १९॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे
रासक्रीडायां गोपीगीतं नामैकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥

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