श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः।

आगता ह्युपपन्‍नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः॥ २३

athavā madabhisnehād bhavatyo yantritāśayāḥ|

āgatā hyupapannaṃ vaḥ prīyante mayi jantavaḥ|| 23

अर्थ

अथवा यदि मेरे प्रेमसे परवश होकर तुमलोग यहाँ आयी हो तो इसमें कोई अनुचित बात नहीं हुई, यह तो तुम्हारे योग्य ही है; क्योंकि जगत‍्के पशु-पक्षीतक मुझसे प्रेम करते हैं, मुझे देखकर प्रसन्‍न होते हैं॥ २३॥✎ 1818

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1818 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): सेवा → और सतियोंकी सेवा

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