श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

तद् यात मा चिरं गोष्ठं शुश्रूषध्वं पतीन् सतीः।

क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्‍च तान् पाययत दुह्यत॥ २२

tad yāta mā ciraṃ goṣṭhaṃ śuśrūṣadhvaṃ patīn satīḥ|

krandanti vatsā bālāśca tān pāyayata duhyata|| 22

अर्थ

अब देर मत करो, शीघ्र-से-शीघ्र व्रजमें लौट जाओ। तुमलोग कुलीन स्त्री हो और स्वयं भी सती हो; जाओ, अपने पतियोंकी और सतियोंकी सेवा-शुश्रूषा करो। देखो, तुम्हारे घरके नन्हे-नन्हे बच्चे और गौओंके बछड़े रो-रँभा रहे हैं; उन्हें दूध पिलाओ, गौएँ दुहो॥ २२॥✎ 1818

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1818 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): सेवा → और सतियोंकी सेवा

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