॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.29.2
तदोडुराजः ककुभः करैर्मुखं
प्राच्या विलिम्पन्नरुणेन शन्तमैः।
स चर्षणीनामुदगाच्छुचो मृजन्
प्रियः प्रियाया इव दीर्घदर्शनः॥ २
tadoḍurājaḥ kakubhaḥ karairmukhaṃ
prācyā vilimpannaruṇena śantamaiḥ|
sa carṣaṇīnāmudagācchuco mṛjan
priyaḥ priyāyā iva dīrghadarśanaḥ|| 2
अर्थ
भगवान्के संकल्प करते ही चन्द्रदेवने प्राची दिशाके मुखमण्डलपर अपने शीतल किरणरूपी करकमलोंसे लालिमाकी रोली-केसर मल दी, जैसे बहुत दिनोंके बाद अपनी प्राणप्रिया पत्नीके पास आकर उसके प्रियतम पतिने उसे आनन्दित करनेके लिये ऐसा किया हो! इस प्रकार चन्द्रदेवने उदय होकर न केवल पूर्वदिशाका, प्रत्युत संसारके समस्त चर-अचर प्राणियोंका सन्ताप—जो दिनमें शरत्कालीन प्रखर सूर्य-रश्मियोंके कारण बढ़ गया था—दूर कर दिया॥ २॥✎ 1430