श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

दृष्ट्वा कुमुद्वन्तमखण्डमण्डलं

रमाननाभं नवकुंकुमारुणम्।

वनं च तत्कोमलगोभिरंजितं

जगौ कलं वामदृशां मनोहरम्॥ ३

dṛṣṭvā kumudvantamakhaṇḍamaṇḍalaṃ

ramānanābhaṃ navakuṃkumāruṇam|

vanaṃ ca tatkomalagobhiraṃjitaṃ

jagau kalaṃ vāmadṛśāṃ manoharam|| 3

अर्थ

उस दिन चन्द्रदेवका मण्डल अखण्ड था। पूर्णिमाकी रात्रि थी। वे नूतन केशरके समान लाल-लाल हो रहे थे, कुछ संकोचमिश्रित अभिलाषासे युक्त जान पड़ते थे। उनका मुखमण्डल लक्ष्मीजीके समान मालूम हो रहा था। उनकी कोमल किरणोंसे सारा वन अनुरागके रंगमें रँग गया था। वनके कोने-कोनेमें उन्होंने अपनी चाँदनीके द्वारा अमृतका समुद्र उड़ेल दिया था। भगवान् श्रीकृष्णने अपने दिव्य उज्ज्वल रसके उद्दीपनकी पूरी सामग्री उन्हें और उस वनको देखकर अपनी बाँसुरीपर व्रजसुन्दरियोंके मनको हरण करनेवाली कामबीज ‘क्लीं’ की अस्पष्ट एवं मधुर तान छेड़ी॥ ३॥

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