श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.27.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

गम्यतां शक्र भद्रं वः क्रियतां मेऽनुशासनम्।

स्थीयतां स्वाधिकारेषु युक्तैर्वः स्तम्भवर्जितैः॥ १७

gamyatāṃ śakra bhadraṃ vaḥ kriyatāṃ me'nuśāsanam|

sthīyatāṃ svādhikāreṣu yuktairvaḥ stambhavarjitaiḥ|| 17

अर्थ

इन्द्र! तुम्हारा मंगल हो। अब तुम अपनी राजधानी अमरावतीमें जाओ और मेरी आज्ञाका पालन करो। अब कभी घमंड न करना। नित्य-निरन्तर मेरी सन्‍निधिका, मेरे संयोगका अनुभव करते रहना और अपने अधिकारके अनुसार उचित रीतिसे मर्यादाका पालन करना॥ १७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें