श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.27.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

अथाह सुरभिः कृष्णमभिवन्द्य मनस्विनी।

स्वसन्तानैरुपामन्त्र्य गोपरूपिणमीश्‍वरम्॥ १८✎ 2084

athāha surabhiḥ kṛṣṇamabhivandya manasvinī|

svasantānairupāmantrya goparūpiṇamīśvaram|| 18

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् इस प्रकार आज्ञा दे ही रहे थे कि मनस्विनी कामधेनुने अपनी सन्तानोंके साथ गोपवेषधारी परमेश्‍वर श्रीकृष्णकी वन्दना की और उनको सम्बोधित करके कहा—॥ १८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2084 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): मन्त्रॺ गोप → मन्त्र्य गोप

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