श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.27.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

मामैश्‍वर्यश्रीमदान्धो दण्डपाणिं न पश्यति।

तं भ्रंशयामि सम्पद‍्भ्यो यस्य चेच्छाम्यनुग्रहम्॥ १६

māmaiśvaryaśrīmadāndho daṇḍapāṇiṃ na paśyati|

taṃ bhraṃśayāmi sampadbhyo yasya cecchāmyanugraham|| 16

अर्थ

जो ऐश्‍वर्य और धन-सम्पत्तिके मदसे अंधा हो जाता है, वह यह नहीं देखता कि मैं कालरूप परमेश्‍वर हाथमें दण्ड लेकर उसके सिरपर सवार हूँ। मैं जिसपर अनुग्रह करना चाहता हूँ, उसे ऐश्‍वर्यभ्रष्ट कर देता हूँ॥ १६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें