श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

आप्लुत्याम्भसि कालिन्द्या जलान्ते चोदितेऽरुणे।

कृत्वा प्रतिकृतिं देवीमानर्चुर्नृप सैकतीम्॥ २

āplutyāmbhasi kālindyā jalānte codite'ruṇe|

kṛtvā pratikṛtiṃ devīmānarcurnṛpa saikatīm|| 2

अर्थ

राजन्! वे कुमारी कन्याएँ पूर्व दिशाका क्षितिज लाल होते-होते यमुनाजलमें स्नान कर लेतीं और तटपर ही देवीकी बालुकामयी मूर्ति बनाकर सुगन्धित चन्दन, फूलोंके हार, भाँति-भाँतिके नैवेद्य, धूप-दीप, छोटी-बड़ी भेंटकी सामग्री, पल्लव, फल और चावल आदिसे उनकी पूजा करतीं॥ २-३॥✎ 1426 1427

यह अर्थ श्लोक 2–3 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1426 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: हाथ-में-हाथ → हाथमें-हाथ
  • #1427 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): की → कीं

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