श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

अथ द्वाविंशोऽध्यायः

चीरहरण

श्रीशुक उवाच

हेमन्ते प्रथमे मासि नन्दव्रजकुमारिकाः।

चेरुर्हविष्यं भुंजानाः कात्यायन्यर्चनव्रतम्॥ १

hemante prathame māsi nandavrajakumārikāḥ|

cerurhaviṣyaṃ bhuṃjānāḥ kātyāyanyarcanavratam|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब हेमन्त ऋतु आयी। उसके पहले ही महीनेमें अर्थात् मार्गशीर्षमें नन्दबाबाके व्रजकी कुमारियाँ कात्यायनी देवीकी पूजा और व्रत करने लगीं। वे केवल हविष्यान्‍न ही खाती थीं॥ १॥

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