श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.21.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणु-

र्दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्।

भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं ह्रदिन्यो ✎ 1152

हृष्यत्त्वचोऽश्रुमुमुचुस्तरवो यथाऽऽर्याः॥ ९

gopyaḥ kimācaradayaṃ kuśalaṃ sma veṇu-

rdāmodarādharasudhāmapi gopikānām|

bhuṅkte svayaṃ yadavaśiṣṭarasaṃ hradinyo

hṛṣyattvaco'śrumumucustaravo yathā''ryāḥ|| 9

अर्थ

अरी गोपियो! यह वेणु पुरुष जातिका होनेपर भी पूर्वजन्ममें न जाने ऐसा कौन-सा साधन-भजन कर चुका है कि हम गोपियोंकी अपनी सम्पत्ति—दामोदरके अधरोंकी सुधा स्वयं ही इस प्रकार पिये जा रहा है कि हमलोगोंके लिये थोड़ा-सा भी रस शेष नहीं रहेगा। इस वेणुको अपने रससे सींचनेवाली ह्रदिनियाँ आज कमलोंके मिस रोमाञ्चित हो रही हैं और अपने वंशमें भगवत्प्रेमी सन्तानोंको देखकर श्रेष्ठ पुरुषोंके समान वृक्ष भी इसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़कर आँखोंसे आनन्दाश्रु बहा रहे हैं॥ ९॥✎ 1425

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1152 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदिन्यो → ह्रदिन्यो
  • #1425 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदिनियाँ → ह्रदिनियाँ

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