श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.21.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

चूतप्रवालबर्हस्तबकोत्पलाब्ज-

मालानुपृक्तपरिधानविचित्रवेषौ ।

मध्ये विरेजतुरलं पशुपालगोष्ठ्यां

रंगे यथा नटवरौ क्व च गायमानौ॥ ८

cūtapravālabarhastabakotpalābja-

mālānupṛktaparidhānavicitraveṣau |

madhye virejaturalaṃ paśupālagoṣṭhyāṃ

raṃge yathā naṭavarau kva ca gāyamānau|| 8

अर्थ

अरी सखी! जब वे आमकी नयी कोंपलें, मोरोंके पंख, फूलोंके गुच्छे, रंग-बिरंगे कमल और कुमुदकी मालाएँ धारण कर लेते हैं, श्रीकृष्णके साँवरे शरीरपर पीताम्बर और बलरामके गोरे शरीरपर नीलाम्बर फहराने लगता है, तब उनका वेष बड़ा ही विचित्र बन जाता है। ग्वालबालोंकी गोष्ठीमें वे दोनों बीचो-बीच बैठ जाते हैं और मधुर संगीतकी तान छेड़ देते हैं। मेरी प्यारी सखी! उस समय ऐसा जान पड़ता है मानो दो चतुर नट रंगमंचपर अभिनय कर रहे हों। मैं क्या बताऊँ कि उस समय उनकी कितनी शोभा होती है॥ ८॥✎ 1425

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1425 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदिनियाँ → ह्रदिनियाँ

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