श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.21.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

अथैकविंशोऽध्यायः

वेणुगीत

श्रीशुक उवाच

इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना।

न्यविशद् वायुना वातं सगोगोपालकोऽच्युतः॥ १

itthaṃ śaratsvacchajalaṃ padmākarasugandhinā|

nyaviśad vāyunā vātaṃ sagogopālako'cyutaḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शरद् ऋतुके कारण वह वन बड़ा सुन्दर हो रहा था। जल निर्मल था और जलाशयोंमें खिले हुए कमलोंकी सुगन्धसे सनकर वायु मन्द-मन्द चल रही थी। भगवान् श्रीकृष्णने गौओं और ग्वालबालोंके साथ उस वनमें प्रवेश किया॥ १॥✎ 884

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #884 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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