श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.21.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

कुसुमितवनराजिशुष्मिभृंग-

द्विजकुलघुष्टसरःसरिन्महीध्रम् ।

मधुपतिरवगाह्य चारयन् गाः

सहपशुपालबलश्‍चुकूज वेणुम्॥ २

kusumitavanarājiśuṣmibhṛṃga-

dvijakulaghuṣṭasaraḥsarinmahīdhram |

madhupatiravagāhya cārayan gāḥ

sahapaśupālabalaścukūja veṇum|| 2

अर्थ

सुन्दर-सुन्दर पुष्पोंसे परिपूर्ण हरी-हरी वृक्ष-पंक्तियोंमें मतवाले भौंरे स्थान-स्थानपर गुनगुना रहे थे और तरह-तरहके पक्षी झुंड-के-झुंड अलग-अलग कलरव कर रहे थे, जिससे उस वनके सरोवर, नदियाँ और पर्वत—सब-के-सब गूँजते रहते थे। मधुपति श्रीकृष्णने बलरामजी और ग्वालबालोंके साथ उसके भीतर घुसकर गौओंको चराते हुए अपनी बाँसुरीपर बड़ी मधुर तान छेड़ी॥ २॥✎ 884

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #884 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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