श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

नैवाविदन् क्षीयमाणं जलं गाधजलेचराः।

यथाऽऽयुरन्वहं क्षय्यं नरा मूढाः कुटुम्बिनः॥ ३७

naivāvidan kṣīyamāṇaṃ jalaṃ gādhajalecarāḥ|

yathā''yuranvahaṃ kṣayyaṃ narā mūḍhāḥ kuṭumbinaḥ|| 37

अर्थ

छोटे-छोटे गड्ढोंमें भरे हुए जलके जलचर यह नहीं जानते कि इस गड्ढेका जल दिन-पर-दिन सूखता जा रहा है—जैसे कुटुम्बके भरण-पोषणमें भूले हुए मूढ़ यह नहीं जानते कि हमारी आयु क्षण-क्षण क्षीण हो रही है॥ ३७॥

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