छोटे-छोटे गड्ढोंमें भरे हुए जलके जलचर यह नहीं जानते कि इस गड्ढेका जल दिन-पर-दिन सूखता जा रहा है—जैसे कुटुम्बके भरण-पोषणमें भूले हुए मूढ़ यह नहीं जानते कि हमारी आयु क्षण-क्षण क्षीण हो रही है॥ ३७॥
नैवाविदन् क्षीयमाणं जलं गाधजलेचराः।
यथाऽऽयुरन्वहं क्षय्यं नरा मूढाः कुटुम्बिनः॥ ३७
छोटे-छोटे गड्ढोंमें भरे हुए जलके जलचर यह नहीं जानते कि इस गड्ढेका जल दिन-पर-दिन सूखता जा रहा है—जैसे कुटुम्बके भरण-पोषणमें भूले हुए मूढ़ यह नहीं जानते कि हमारी आयु क्षण-क्षण क्षीण हो रही है॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.20.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 263) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/20/37/